माँ मड़वारानी दाई की कल्पवृक्ष मे जवा अपने आप उगने तथा माँ को विभिन्न रुप मे मडवारानी पहाड़ के नीचे स्थित ग्राम के चरवाहों और किसानों को दर्शन मिलने तथा माताजी द्वारा सुन्दर कन्या रुप धारण कर और शेर पर सवार होकर भ्रमण करने की जानकारी मिलने लगी।
मड़वारानी दाई की महिमा एवं अपार श्रध्दा के कारण तराई के सभी ग्रामों में मड़वारानी दाई की पुजा अर्चना धुम धाम से होती है इस कारण ग्राम कोथारी, बरपाली, सरगबुंदिया की एवं आस-पास के बहुत से ग्राम में माता मड़वारानी दाई की मंदिर निर्माणकर मड़वारानी दाई को स्थापित करके प्रतिदिन पुजा अर्चना करते है। माँ मड़वारानी के पावन स्थल पूर्णतः जंगलपर स्थित है। वर्तमान में वर्तमान पहाड के नीचे वाले सभी गांवों में पक्की सड़क, हेण्ड पंप, बिजली, स्कूल, के लिए रकम की व्यवस्था हो गई तथा पहाड़ के तरफ नीचे रोड पक्की-कच्ची स्थित है।
आदिशक्ति पर्वतवासिनी माँ मड़वारानी दाई के पावन स्थान का भौगोलिक स्थल का विवरण राजस्व एवं मानचित्र के आधार पर भारत गणराज्य के प्रांत छत्तीसगढ़ राज्य के जिला-कोरबा, तहसील करतला, पुलिस चौकी उरगा व जिला-कोरबा (छत्तीसगढ़) के अंतर्गत उपतहसील क्षेत्र बरपाली के राजस्व ग्राम मड़वारानी (खरहरी), बीरतराई, महोरा, झीका, कुररहीया, मैसामुडा, सन्डैल, बरपाली, पुरेना, परसाभाठा, जर्वे के आम निस्तार एवं उपयोग में माता मड़वारानी दाई के निवास स्थल मड़वारानी पहाड़ की चोटी पर स्थित है।
मड़वारानी पहाड़ कोरबा चाम्पा मुख्य सड़क मार्ग, रेल मार्ग से मड़वारानी (खरहरी) ग्राम से कोरबा चाम्पा मुख्य सड़क के बीरतराई, नाका, भाठापारा, महोरा होकर झीका से एवं कुररहीया, भैसामुडा, सन्डैल, बरपाली से तथा पुरेना से जाने के लिए माता मड़वारानी के पावन स्थल पर जाने हेतु पगडंडी रास्ता था, जो बिहड़ जंगलों में पार करके जाना होता था। आने-जाने के लिए कोई स्थाई रास्ता नहीं था। आने-जाने में पहाड़ के कई मार्गों में भटकते-भटकते जाना पड़ता था। उस समय पहाड़ ऊपर स्थित ऊँचे-ऊँचे पेड़ एवं पत्थर चट्टान को ही आधार मानकर चलते थे तथा उसी के आधार पर आने-जाने का मार्ग था।
बीरतराई के पहाड़ के नीचे-नीचे महोरा के बस्ती के ऊपर पहाड़ वालीनाला, झोरखा को पार करते हुए झीका के ऊपर कटीले मार्ग से होते हुए माता के स्थान पर पहाड़ ऊपर पहुँचते थे तथा खरहरी, जर्वे से नीचे से पुरेना, बरपाली के आगे पहाड़ किनारे जो सन्डैल, भैसामुडा, कुररहीया के पास चुहरी से जाते थे तथा ग्रामवासियों द्वारा निस्तार लकड़ी, पशुओं के चारागाह एवं आम निस्तार, लकड़ी, पशुओं के चारागाह एवं आम निस्तार के रास्ते से आना-जाना करते थे।
इसी के आधार पर माता के पावन स्थल पर पहुँचने का मार्ग, रास्ता, पगडंडी का जो नाला, पत्थर, झाड़ी से अव्यवस्थित था। उक्त मड़वारानी पहाड़ घने काले जंगल जहाँ माता मड़वारानी दाई के चोटियों से ठीक नीचे देखने पर हसदेव नदी है। तथा पहाड़ के अंतिम छोर के अगल-बगल पूर्णतः खाई है जो पत्थर के चट्टान है। उसमें नीचे उतरने या चढ़ने का कोई स्थान नहीं है, नीचे पूर्णतः खाई है।
इसी अंतिम स्थल पर माता का स्थान है जहाँ पर पहले का कलमी का पेड़ था, जहाँ पर बेल के वृक्ष चारों तरफ फैले हुए हैं तथा उस कलमी पेड़ के स्थान पर छोटा मंदिर था, जिसका अभी वर्तमान में भव्य मंदिर नवनिर्माण कार्य पिंड मूल स्थान पर निर्मित हो रहा है।
पहले वहाँ जाने के लिए थोड़ा सा नीचे उतरने पर खाई स्थल को थीपापानी कहते हैं, जो बारहों मास पानी बुदबुद कर सींचता रहता है, जो माता की कृपा से है। पहाड़ ऊपर ही कई छोटे-बड़े पहाड़ हैं, जिसके बीचो-बीच बड़ी-बड़ी खाई सहित नाला है, जो देखने एवं चढ़ने में अत्यंत दुर्गम स्थान तथा चारों तरफ पहाड़ है।
पहाड़ के नीचे मुख्य कोरबा चांपा मार्ग पर आने से सोन नदी है। माता के पावन स्थान मड़वारानी पहाड़ के चारों तरफ प्राकृतिक सौंदर्य, शक्ति विराजमान है। उस आदिशक्ति माता के पावन स्थल के सामने में उस स्थान तालाब पहाड़ में था जहाँ माता जी स्नान करती थी, वर्तमान में तालाब नहीं है।
पहाड़ ऊपर पत्थर के चट्टान जो सुरंग में बना है, जिसे बड़े खेलिया कहते हैं, वहाँ पर जंगल में विचरण करने वाले जीव-जंतु विचरण करते थे। पहाड़ में एक स्थान पर बहुत ज्यादा सराई के वृक्षों से आच्छादित है, जिसे सरैया कहते हैं, जहाँ कि जंगल में रहने वाले जीव-जंतु विचरण करते हैं।
जिनके साक्षात दर्शन एवं पदचिन्ह हमेशा मिलते थे, जिसमें शेर (बाघ) था, जो माता की सवारी है। उसका दर्शन एवं पदचिन्ह को देखने को मिलते थे, जिसे शेर (बाघ) के नाम से डरते थे, लेकिन माता की सवारी का पदचिन्ह देखकर प्रणाम कर आत्मा संतुष्टि मिलती थी।
यहाँ बंदर, छोटे-बड़े सभी प्रकार के मिलते हैं। पहाड़ ऊपर ही विशाल रूप में फैले हैं, जो बड़े-बड़े पेड़ एवं नाला है। उक्त पानी नाला झरोखा से बने गड्ढे जो पत्थर को काटकर कुएँ की तरह बना, उसमें जो पानी दिखता है वह काला है। लेकिन उस पानी को उस कुंड से बाहर निकालने पर वह साफ, स्वच्छ एवं मीठा जल है, जो स्वादिष्ट एवं औषधी की तरह है, जिसे पीने पर शरीर की सम्पूर्ण थकान दूर हो जाती है और तरो-ताजा हो जाती है।
मड़वारानी पहाड़ के स्थल से नीचे के बाद सीधे रास्ते में दाहिने दिशा में जाने पर पहाड़ है उसे जालादारी कहते हैं। पूर्व में जहाँ घने जंगल होने से आस-पास के जो जंगली पशुओं-जानवरों का शिकार करते थे वे लोग यहाँ आकर अपनी जाल को फैलाते थे। एक ओर से घेरते हुए जाने पर मनमुग्ध पशु उस जाल में फँस जाते हैं। इस कारण इस स्थान को जालाद्वारी कहते हैं।
बीरतराई भाटापारा के पहाड़ के ठीक मोड़ में चिराई खोल है, जहाँ बड़े-बड़े घने पेड़ एवं पक्षी अधिक रहते थे तथा उस स्थान पर गिदराईल, सुआ गेटूर नामक पक्षी बहुत अधिक थी। उसी के पास हाथी जैसे बहुत बड़े चट्टान की पत्थर है। तथा वहाँ पर पत्थर के चट्टान के नीचे सुरंगें हैं, जहाँ अंदर नीचे खाली जगह है, जहाँ पर अंधेरा काला स्थान है। कितना लम्बा स्थान है अभी तक ठीक-ठीक पता नहीं चल पाया है।
बीरतराई गाँव के ठीक ऊपर चीतामाड़ा है, जहाँ पुराने जमाने पर चीता निवास करता था। जंगल कटने पर वर्तमान केवल गिदराईल पक्षी, मयूर, खरगोश अन्य पशु-पक्षी रहते हैं। चीतामाड़ा में अंदर माड़ा है। पहाड़ पर स्थित ऊपर चट्टान के बाद पेड़ वृक्ष है लेकिन ठीक नीचे काले पत्थर का चट्टान है, जिसके नीचे दो बड़े-बड़े सुरंग हैं, जहाँ चीता बैठकर आराम करता था। इस कारण उसे चीतामाड़ा कहते हैं।
पहाड़ के ठीक नीचे बीरतराई ग्राम है जो पुरातत्व की धरोहर है। यहाँ पुराने वर्षों में देवराज (देवस्थल) के पास कुंड था जिसे अमृत कुंड कहते थे। जो व्यक्ति उस कुंड के पानी को पी लेता था वह अधिक बलवान हो जाता था तथा उस कुंड के पानी को जिस हथियार ने छुआने के बाद वह धारदार हो जाता था तथा बड़े से बड़े वृक्ष को काटा करता था। अमृत कुंड के पानी को पीकर बलवान हो जाते थे तथा वह अपनी उस ताकत का दुरुपयोग करने लगे तथा उस कुंड को पाट दिया गया।
वहीं पर बड़कामुड़ा नामक बहुत बड़ा तालाब है जो पहाड़ के ठीक नीचे है। उस पहाड़ के नीचे तालाब के नीचे में देव स्थान है जहाँ पर छहमासी रात में मंदिर निर्माण हो रहा था। मंदिर बनाते-बनाते निर्माण में उपयोग होने वाली छीनी कहीं गिर गई जिसे बहुत ढूँढते रहे थे तथा मंदिर निर्माण की शर्त थी कि अँधेरी रात में निर्माण होना था। यदि प्रकाश जलाने पर शर्त के अनुसार निर्माण ध्वस्त हो जाएगा, लेकिन मंदिर निर्माण में उपयोग होने वाली छीनी को ढूँढने के लिए प्रकाश जलाया गया। जैसे ही प्रकाश फैला मंदिर निर्माण ध्वस्त हो गया तथा उसके अवशेष अगल-बगल में बिखर गए।
मंदिर में स्थापित होने वाली देवी-देवता की मूर्ति यत्र-तत्र मिट्टी टीला में दबा हुआ है तथा कृषकों के खेत में भी दूर-दूर तक फैले हैं, जो कृषक खेमनलाल के खेत की खुदाई करने पर, खेती करने से जमीन के नीचे पड़े भूमि पर राम-सीता, लक्ष्मण, भरत मिलन, गणेश, शीतला माँ, हाथी, घोड़ा, विष्णु भगवान, कलश, गंगार के साइज की निकली हैं।
जिसमें से कुछ मूर्ति पुरातत्व विभाग द्वारा धरोहर के रूप में रखने के लिए कोरबा स्थित पुरातत्व संग्रहालय में लाए हैं तथा शेष बड़कामुड़ा तालाब में स्थित प्राचीन मंदिर में रखे हैं।
तथा शिवलिंग को कनकी ले जा रहे थे जो उस जमाने में बैलगाड़ी से ले जा रहे थे तो सात बार बैलगाड़ी टूटा एवं शिवलिंग भी दो टुकड़ा हो गया, जिसमें एक हिस्सा कनकी के मंदिर में है, दूसरा हिस्सा बीरतराई स्थित शंकर भगवान की मंदिर है।
तथा बोईरहा तालाब में कालीमाता एवं तालवा में भैंसासुर सर्पिन (सत बहिनिया) की पूजा तथा ठाकुर देवता की पूजा-अर्चना आज भी होते आ रही है। बताते हैं कि संसार के अढ़ाई दिन के खर्चा (धन-दौलत) देउर स्थान जहाँ मंदिर का निर्माण हो रहा था वहाँ स्थित है।
मुख्यमार्ग कोरबा-चाम्पा के मड़वारानी पहाड़ के किनारे में खरहरी ग्राम स्थित है। इस ग्राम में पानी का बहाव ठहर नहीं पाता था तथा वर्षा का पानी भी नहीं रुकता था, और पहाड़ से निकलने वाली पानी का बहाव खरहरी से निकल कर सोन नदी में बह जाने इस कारण इसे खरहरी कहते हैं। यहाँ खरहरी पाठ में पूजा-अर्चना होती है।
पहाड़ के नीचे ग्राम पुरेना है जहाँ पहले पुरेनिया तालाब के पास ग्राम की बस्ती थी। इस तालाब में सोने-चाँदी के बड़े-बड़े गंगार थे जिसकी सुरक्षा स्वयं माता जी करती थीं। उस तालाब में मछली पकड़ने के लिए नाव लेकर जाने पर एक भी मछली नहीं मिलती थी एवं ऐसी ही पकड़ने पर मछली मिल जाती थी।
कहते हैं कि सोन नदी के नरई दहरा से उड़द दाल को धोने से दाल के साथ छिलका प्रवाह में पुरेनिहा जर्वे तालाब में निकलता था। ठाकुर देव है। खरहरी एवं पुरेना में पहाड़ किनारे पर कोठी खोला नामक स्थान, जो भौगोलिक रूप से छत्तीसगढ़ के किसानों द्वारा खेती से उपज धान को रखने के लिए कोठी बने हैं। कोठीखोला में बहुत बड़े-बड़े झाड़ हैं। वैसे ही पूरे क्षेत्र में विस्तार से देखने पर कोठीखोला से आवाज लगाने पर बाघमाड़ा में सुनाई पड़ता था।
मड़वारानी दाई की महिमा एवं अपार श्रद्धा के कारण तराई के सभी ग्रामों में मड़वारानी दाई की पूजा-अर्चना धूमधाम से होती है। इस कारण ग्राम कोथारी, बरपाली, सरगबुदिया एवं आस-पास के बहुत से ग्राम में माता मड़वारानी दाई की मंदिर निर्माण कर मड़वारानी दाई को स्थापित करके प्रतिदिन पूजा-अर्चना करते हैं।
माँ मड़वारानी के पावन स्थल पूर्णतः जंगल पर स्थित है। वर्तमान में मड़वारानी पहाड़ के नीचे वाले सभी गाँवों में पक्की सड़क, हैंडपंप, बिजली, स्कूल के लिए रकम की व्यवस्था हो गई तथा पहाड़ की तरफ नीचे रोड पक्की-कच्ची स्थित है।