प्राचीन मुख्य मड़वारानी दाई मंदिर (पहाड़ ऊपर)

माँ मड़वारानी - पौराणिक महत्व

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पौराणिक महत्व

पौराणिक महत्व

प्राचीन मान्यता है कि माता मड़वारानी के रंग-रूप में अनेक बार अनेकों रूप में श्रद्धालुगणों को दर्शन दिया। माता कभी सुंदर कन्या के रूप में दर्शन कराये हैं। कहते हैं कि माता जी पूर्व के वर्षों में बरपाली, भैसमा, सोहागपुर, कोरबा के बाजारों में सुंदर श्रृंगार कर देवरी लेकर बाजार जाया करती थी और वहाँ से सामग्री भी क्रय करती थी।

कभी सुंदर कन्या रूप में, कभी वृद्ध महिला के रूप में, कभी अन्य रूप में माता की पूरे क्षेत्र में विराजमान होकर आने-जाने का कार्य करते थे। एक दिन माता जी श्रृंगार करके बाजार गयी हुई थी। उसने अपने श्रृंगार में सोने के गहने पहन रखे थे, जिसे देखकर कुछ लोग पीछा करते-करते आ रहे थे। जब माता जी को जंगल की ओर अकेला घेर लिया तब माता शेर के रूप में दिखाई देने से पीछा करने वाले उल्टे पाँव भागे। जिसकी जानकारी देने पर लोगों का विश्वास बढ़ते रहा। इस प्रकार और कई घटना घटित हुआ जिससे लोगों मानना प्रारंभ हुआ तथा उस पर आस्था एवं विश्वास बढ़ते गया।

माँ मड़वारानी पहाड़ के तराई के गाँवों के किसानों की मवेशी को चराने का काम सभी ग्राम में रावत लोग करते थे। एक दिन एक रावत अपने मवेशी को चराने गया था लेकिन मवेशी चरवाहा की नजर से ओझिल हो गया तो उसने अपने उक्त मवेशी को ढूँढते-ढूँढते पहाड़ ऊपर चढ़ गया तथा थक कर बैठा था और दिन ढल रहा था।

तब मड़वारानी दाई ने एक वृद्ध महिला के रूप में चरवाहा के पास जाकर कहा, कैसे बैठे हो? तब चरवाहा ने बताया कि मवेशी गुम गया है। तब दाई ने कहा कि जाओ, रास्ते के स्थान पर जहाँ बड़ी झाड़ है वहाँ आपके मवेशी बैठे हुए हैं।

तब चरवाहा माता के कहे स्थान पर गया जहाँ मवेशी बैठे थे, जिसे लेकर चरवाहा ने अपने गाँव के किसान के पास पहुँचाया और उक्त घटना को विस्तार से बताया। तब वहाँ के मालगुजार ने हाथी-घोड़ा में सवार होकर गाँववासियों के साथ कहा आया और चरवाहा के बताये हुए स्थान पर गया।

मड़वारानी तराई के गाँव के एक व्यक्ति द्वारा एक दिन अपने गायों को चरा रहा था। चराते हुए पहाड़ के ऊपर पहुँच गया और वहाँ बैठा हुआ था। उसी दौरान माताजी ने उसे कहा कि यहाँ देर तक गैया चराते हो, भूखा है कुछ खा ले। तब माताजी द्वारा दिये भोजन को ग्रहण किया तथा उस चरवाहे का माताजी से बार-बार मुलाकात हुई।

तब चरवाहा ने एक दिन माता का पीछे-पीछे जा रहा था। लोग कह रहे थे, उसे देखे। तब माता की मंदिर के नीचे खाई जो पत्थर के चट्टान से बनी अंदर गुफा में प्रवेश किया, जिसे चरवाहा ने देख लिया। तब माताजी ने उस गुफा में आने के रास्ते को बंद कर दिया।

तब जो सामान्य आने-जाने का रास्ता था, जिसे माताजी ने एकदम से बंद किया, तब वह स्थान खाई में परिवर्तित हो गया, जिसमें उसके बाद कोई भी आदमी आना-जाना नहीं कर सका और माताजी अपने दर्शन कराते रहते हैं।

इस बात को चरवाहा ने गाँव के लोगों को बताया तथा एक बात एक व्यक्ति एवं गाँवों में फैलने लगा। लोगों को ताता लगा। उसके बाद माता की कृपा से मड़वारानी मंदिर के पावन स्थल पर कलमी के पेड़ में क्वार के माह पंचमी में कलमी के पेड़ की डंगाली में ज्वारा अपने आप आ गया था, जिसे माता की कृपा से ज्वारा आया।

जिसे देखने के बाद उसने अपने ग्राम में एवं आस-पास के गाँव में जानकारी हुई। तब उस समय के तत्कालीन राजा ने भी मालगुजार एवं प्रजा के साथ उक्त पहाड़ ऊपर आकर देखा। तब उनके मन में भी माता के प्रति अपार श्रद्धा हुई, जिसकी सभी श्रद्धा के साथ पूजा-अर्चना किया गया।

तथा तेरस के दिन शाम होते ही कलमी पेड़ में उगे ज्वारा अपने आप विलुप्त-विसर्जित हो गए। जिसको देखकर उस समय के राजा ने अपने प्रजा सहित माता मड़वारानी दाई के दर्शन करने पहाड़ ऊपर आये थे। उसी समय से आस-पास के ग्रामों के लोग इकट्ठा होकर प्रतिवर्ष माता मड़वारानी दाई की क्वार शादी नवरात्रि पर्व के पंचमी के दिन माता की कृपा से ज्योति कलश प्रज्ज्वलित करना प्रारंभ हुआ तथा तेरस तिथि पर ज्योति कलश का विसर्जन का कार्य किया जाता रहा है।

माता मड़वारानी दाई की सच्चे मन से जो भी मन्नत माँगते हैं माता उसकी मनोकामना पूर्ण करती है। माताजी निःसंतान को संतान देती हैं, रोग-दोष को दूर करती हैं तथा श्रद्धालुओं की मनोकामना को पूर्ण करती हैं।

मड़वारानी दाई के तराई के एवं आस-पास के कस्बा, शहर के लोगों की घर बैठे मन्नत करने पर भी दाई उनकी मनोकामना पूर्ण करती हैं। जिसके कारण कई श्रद्धालुगण माता के दरबार में पैदल, भूमि में लेटते हुए, पहाड़ों वाली माता मड़वारानी दाई की जय हो के जयकारा के साथ कीर्तन-भजन करते हुए माता के दरबार आते हैं और श्रद्धा, भक्ति एवं विश्वास के साथ पूजा-पाठ कर अपनी मंगलकामना कर माता का शुभ आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। माता श्रद्धालुओं की मनोकामना को पूर्ण करती हैं।

मड़वारानी दाई के पावन स्थल पर कलमी का पेड़ था जिस पर दो साँप रहते थे। वह सर्प उस कलमी के पेड़ में विचरण करते रहते थे तथा वह कलमी का पेड़ में बीचों-बीच खोखरा था जिसमें हमेशा पानी रहता था।

उस खोखरा के पानी को चाहे गर्मी का मौसम हो, ठंड का मौसम हो, उस खोखरे से कितना भी पानी निकालो पानी कम नहीं होता तथा पानी सूखता नहीं था।

एक दिन एक लकड़हारा ने उक्त पेड़ के पानी को पिया तथा उनके द्वारा पानी पीने के गिलास को उस खोखरे में पानी निकालते समय गिरा डाला तथा वह अपने हाथ से उस गिलास से खोखले से निकाल नहीं पाया।

जब वह अपने गिलास को खोखरे से निकाल रहा था तब उस कलमी के पेड़ में दो सर्प विचरण कर रहे थे, जिसे देखकर डर गया और उनके द्वारा लकड़ी के डंठल से मार दिया, जिसमें एक सर्प की मृत्यु हो गयी।

तथा उस कलमी के पेड़ के खोखरे को काटकर गिलास को निकाल कर ले गया और जाते ही उसकी मृत्यु हो गयी तथा आकाशीय बिजली के कारण उक्त कलमी पेड़ जलकर नष्ट हो गया।

इस कारण उक्त कलमी पेड़ स्थान पर लकड़ी का झाला-झोपड़ी बनाकर वहाँ पर नवरात्रि पर्व के पंचमी के दिन ज्वारा ज्योति कलश प्रज्ज्वलित कर नवरात्रि पर्व बनाते आ रहे थे।

उसी दौरान गोगीराम नामक व्यक्ति ने माता की कृपा से उसी स्थान पर एक छोटा-सा मंदिर 1966 में निर्माण कराया था। उसी स्थान पर भव्य मंदिर का नव निर्माण कार्य चल रहा है।

ज्योति कलश